जीत गए चुनाव ऐसे,
जंग जीत आए मगर,
खून लाठी कत्ल गोली,
ये कैसी ममता डगर?
प्रजातंत्र के मेले में कौन दिया अधिकार ऐसा,
जीत जाओ जब इलेक्शन कुकर्म करो धिक्कार जैसा।
मत भूलो चुनाव हर पांच साल में आते हैं,
कपड़ों के जैसे पार्टी बदले जातें हैं।
मार रहे हो मजलूमों को,भूख ही है धर्म जिनका,
चौपट धंधे की घड़ी में पार्टी हो ऐसा वैसा कोई भी कैसा।
लूट गई सत्ता अगर तो जनादेश की बात है,
बेटी की अस्मत लूटते हो, क्या तेरी औकात है?
राज करो तो पृथ्वी के जैसा,
गोरी क्यों बने जाते हो,
किसी राज्य को जितने पर मानव भक्षण पे उतर आते हो।
कैसे कुपुत्र ठहरे, शांति का नोबल रो रहा,
रविन्द्र हों या अमर्त्य, आंसू उनको धो रहा ।
तनिक जो आदर्श बचा,बच गई गर इंसानियत,
इस प्रलय की घड़ी में बचा लो बांग्ला की रूमानियत।
जगमोहन

