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कब होगी joining मेरी



कब
होगी Joining .......


परेशान होकर आया हूँ
अपने विभाग का ही सताया हूँ
प्रातः पानी बस पिया था
अब तक कुछ खाया हूँ
खूब काटा
चक्कर ऑफिस का
पर
हरारत थका पाया हूँ
घर पंहुचा
तो लगा अभी
हीं मरहम लगाया हूँ


जाता कहीं, जीवन बेदम सी लगती है
दिन हैं बेजार, रातें बदरंग सी लगती हैं
पढता हूँ तो किताबें नागन सी लगती हैं
post office मुझे मेरे कफ़न सी लगती है


कब जाऊंगा लेकर बैग ? चन चन सी लगती है
होगी मेरी ऑफिस भी, मनसुख हरदम सी लगती है
बस खाता हूँ-पीता हूँ, घर में घुटन सी लगती है
पूछे कोई joining कब होगी, तो चुभन सी लगती है

जल्दी होगी joining मेरी
आशाएं-किरण सी लगती है
जब-जब जाता ऑफिस मै
अपर्णा जी यही कहती हैं .

कितनी हंसती दुनिया मेरी थी
जब मै नौकरी करता था
सुबह ऑफिस जाता था
रात में खर्राटे भरता था

दोस्तों मैं तो भोला था
पप्पू था, बडबोला था
पोस्ट ऑफिस के बुलाने से पहले
उठा लिया वहां से अपना झोला था




© सर्वाधिकार जानाक्षि-मोहन'कल्प'

हिंदी एक अदभूत भाषा

हिंदी एक अदभूत भाषा

अपना
खाना, अपना कपड़ा, अपना ही बिछोना है
जिनकी अपनी भाषा उनका क्या कहना है !!
उर्जा बचती है बकी, द्विभाषा का टशन ना ना है
अंग्रेज़ों की अंग्रेजी, चीनियों का चीनी गहना है
फिर क्यों हिन्दी ओर ना हिन्दी
हिन्दी को लेकर मरते-पीटते रहना है !!

© सर्वाधिकार सुरक्षि-मोहन'कल्प'


तेरे मनमाफिक नज़र आयें कैसे

खुदा
ने बना दी खूबसूरती, तो मन को 'न' बहकाएं कैसे ??

फूलों से न जुदा हो, तो काँटों से बच कर जाएँ कैसे ?

खुसबू हैं, तारे हैं, वादियाँ हैं, और तू कहे

तो रेत का घर, बनायें कैसे ??

भौरा मडराता न तो फूल खिलता

और तू कहे कि तुझे कुछ न करूँ तो

अपने चंचल मन को बहलायें कैसे ??

कवि हूं , बंजर में भी मंजर खिला दूँ

सख्त अपेक्षायों में तेरी, झिलमिल सी भी

नज़र आयें तो आयें कैसे ??

अपने शकल से जाहिर है, उसे छुपायें कैसे ??

तेरी मनमर्जी नज़र आयें, तो आयें कैसे ??

© सर्वाधिकार सुरक्षि-मोहन'कल्प'