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गुनाहगार


गुनहगार है तू...........

सुमन की सुरभि , गलीचो की बहार है तू
भ्रमरों की अनकही प्रीत की फ़ुआर है तू

ये घुंघराले, घुमड़ते, गेशु तेरे
विषधरो से लिपटी बटबाड है तू

ये सरसों के फूल, हंसों कि किलोल
इन शबनम के बूंदों में बारम्बार है तू

इंजन सी तू, ए डब्बे आशिक
इन सबके लिए रोज़गार है तू

वाणी से तेरे टूट जाये वीणा
बला कि ख़ूबसूरत फनकार है तू

डबडबाती अंखियन में कजरन की छाया
चपला मृगा , मतमार है तू

नाको से पद्मा, मगन है मीरा
सितारों से बनी हार है तू

सुराही जैसी कमर तेरी
चिपके जो कपडे कटार है तू

अंगुलिओं पे पड़ी नारंगी रसभरी
लब गुलाबी रसबहार है तू

ए किरणों का छटकना, चित पे खटकना
जांकशी गोधुली कि तलबगार है तू

आ जा पनाहों में कशक कर मुश्क लूँ
ऐसी तमन्ना, गुनाहगार है तू ..........



© सर्वाधिकार सुरक्षित-मोहन'कल्प'

1 comment:

dushyant...DEPUTY COLLECTOR(B.A.S) said...

.........sundarta ki purna paribhasha.hai aapki ye kavita...........